त्विषा शर्मा हत्याकांड केस: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बहुचर्चित त्विषा शर्मा हत्याकांड मामले में अदालत ने मुख्य आरोपी और मृतका की सास गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की अदालत ने बुधवार को करीब तीन घंटे की लंबी बहस के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे कल देर रात जारी किया गया। 17 पन्नों के अपने विस्तृत आदेश में निचली अदालत द्वारा बीती 15 मई को गिरिबाला सिंह को मिली अग्रिम जमानत के फैसले को पूरी तरह निरस्त कर दिया है।
हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि निचली अदालत ने मामले के तथ्यों, गवाहों के बयानों और गंभीर आरोपों पर गहराई से विचार नहीं किया था। हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद पूर्व जज गिरिबाला सिंह पर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है। इस फैसले से पीड़ित परिवार को इंसाफ की उम्मीद जगी है, वहीं जांच एजेंसी को मामले की तह तक जाने का रास्ता मिल गया है।
3 घंटे लंबी बहस के बाद फैसला सुरक्षित
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की एकल पीठ के समक्ष इस संवेदनशील मामले पर बुधवार को करीब तीन घंटे तक मैराथन बहस हुई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे देर रात जारी किया गया। 17 पन्नों के अपने विस्तृत और कड़े आदेश में हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा बीती 15 मई को गिरिबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत के फैसले को पूरी तरह निरस्त (खारिज) कर दिया।

निचली अदालत के फैसले पर सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में निचली अदालत के कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि निचली अदालत ने मामले के तथ्यों, गवाहों के बयानों और आरोपों की गंभीरता पर गहराई से विचार नहीं किया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों और बयानों के आधार पर यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि अपराध और आरोप केवल मृतका के पति समर्थ सिंह तक ही सीमित हैं। घटना में सास की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सीबीआई की मजबूत दलीलें
आपको बता दें कि इस हाई-प्रोफाइल और संवेदनशील मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) कर रही है। जांच एजेंसी ने हाईकोर्ट के सामने जमानत रद्द करने के पक्ष में बेहद मजबूत दलीलें पेश कीं। सीबीआई के वकील ने अदालत को बताया कि यह केवल एक सामान्य विवाद नहीं बल्कि एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है। केस के वास्तविक सच को सामने लाने के लिए आरोपी सास गिरिबाला सिंह को हिरासत में लेना बेहद जरूरी है। एजेंसी ने कोर्ट से कहा कि जब तक आरोपी को कस्टडी में लेकर पूछताछ नहीं की जाएगी, तब तक कई अहम कड़ियों और सबूतों को जोड़ पाना मुमकिन नहीं होगा।

गंभीर धाराओं में दर्ज है मामला
यह पूरा मामला भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की नई धाराओं के तहत दर्ज किया गया है। आरोपियों के खिलाफ बीएनएस की धारा 80(2) (दहेज मृत्यु), धारा 85 (महिला के साथ क्रूरता) और धारा 3(5) (साझा मंशा) के साथ-साथ दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 और 4 के तहत मुकदमा दर्ज है। शिकायतकर्ता यानी मृतका त्विषा शर्मा के परिवार का आरोप है कि शादी के बाद से ही उसे लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था।

पीड़ित पक्ष ने सीधे तौर पर आरोपी सास गिरिबाला सिंह और उनके बेटे समर्थ सिंह पर बेहद संगीन आरोप लगाए हैं। शिकायत के अनुसार, आरोपी सास और पति ने मिलकर मृतका त्विषा पर जबरन गर्भपात (अबॉर्शन) कराने का मानसिक और शारीरिक दबाव बनाया था। विरोध करने पर उसके साथ मारपीट और क्रूरता की जाती थी, जिससे तंग आकर अंततः उसकी जान चली गई।
गर्भपात कराने का था दबाव
हाईकोर्ट के इस आदेश ने साफ कर दिया है कि कानून के सामने हर कोई बराबर है, चाहे वह पूर्व न्यायिक अधिकारी ही क्यों न हो। अब अग्रिम जमानत रद्द होने के बाद सीबीआई किसी भी वक्त गिरिबाला सिंह को गिरफ्तार कर सकती है।
भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं के तहत प्रावधान
यह मामला देश के नए कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दर्ज है। इसमें शामिल मुख्य धाराओं के कानूनी मायने इस प्रकार हैं: धारा 80(2) (दहेज मृत्यु): यदि किसी महिला की मृत्यु शादी के सात साल के भीतर जलने, शारीरिक चोट या असामान्य परिस्थितियों में होती है, और यह साबित होता है कि मौत से ठीक पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था, तो इसे दहेज मृत्यु माना जाता है। इसमें न्यूनतम 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। धारा 85 (महिला के साथ क्रूरता): यदि किसी महिला का पति या उसके रिश्तेदार उसके साथ किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक क्रूरता करते हैं (जो उसे आत्महत्या के लिए उकसाए या गंभीर चोट पहुँचाए), तो वे इस धारा के तहत दोषी माने जाते हैं।

इसमें 3 साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है। धारा 3(5) जब दो या दो से अधिक व्यक्ति मिलकर किसी एक आपराधिक घटना को अंजाम देने की साझा योजना बनाते हैं, तो इस धारा के तहत हर व्यक्ति उस अपराध के लिए बराबर का जिम्मेदार माना जाता है। इस केस में सास और पति दोनों को सह-आरोपी बनाया गया है। दहेज निषेध अधिनियम, 1961 (धारा 3 और 4): इसके तहत दहेज देना, लेना या प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से दहेज की मांग करना गैर-कानूनी है, जिसके लिए कड़ी सजा और भारी जुर्माने का नियम है।
CBI की अब तक की भूमिका
त्विषा शर्मा हत्याकांड की संवेदनशीलता और इसमें एक पूर्व जज (गिरिबाला सिंह) का नाम शामिल होने के कारण निष्पक्ष जांच के लिए यह केस सीबीआई को सौंपा गया था. सीबीआई ने हाईकोर्ट में पुरजोर दलील दी कि आरोपी का रसूख होने के कारण वे गवाहों को प्रभावित कर सकती हैं। केस की कड़ियों को जोड़ने और साजिश का पर्दाफाश करने के लिए उन्हें हिरासत (Custodial Interrogation) में लेना अनिवार्य है। सीबीआई मृतका की मेडिकल हिस्ट्री, कथित तौर पर बनाए गए गर्भपात के दबाव से जुड़े सबूतों और दोनों पक्षों के कॉल डिटेल्स (CDR) को खंगाल रही है।
मृतका के परिवार का पक्ष
त्विषा शर्मा के परिवार का आरोप है कि शादी के बाद से ही उसे एक सुनियोजित साजिश के तहत प्रताड़ित किया जा रहा था। परिवार के अनुसार, निचली अदालत द्वारा पूर्व में सास को दी गई अग्रिम जमानत एकतरफा थी, क्योंकि उसमें दर्ज सबूतों और मुख्य गवाहों के बयानों को नजरअंदाज किया गया था। हाईकोर्ट के इस कड़े फैसले के बाद पीड़ित परिवार ने न्यायपालिका के प्रति आभार जताया है।


























