कोलकाता: पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी गलियारों के साथ प्रशासनिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है. राज्य में चुनावी निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग ने एक बड़ा कदम उठाते हुए राज्य के विभिन्न जिलों में तैनात 83 ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (BDO) और एक असिस्टेंट रिटर्निंग ऑफिसर (ARO) के तबादले के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी है. विधानसभा चुनाव की घोषणा और मुख्य सचिव, डीजीपी और सीपी के बदलाव के बाद हाल के दिनों में यह सबसे बड़े फेरबदलों में से एक है. इनमें से महत्वपूर्ण तबादलों में कोलकाता पुलिस के अंतर्गत आने वाले भाबनीपुर, कालीघाट और हिंसाग्रस्त भांगर के प्रभारी अधिकारियों का तबादला भी शामिल है. इसे राज्य की राजनीतिक बिसात पर चुनाव आयोग की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका सीधा असर जमीनी स्तर पर चुनाव प्रबंधन पर पड़ेगा.
प्रशासनिक फेरबदल: चुनावी मशीनरी को कसने की तैयारी
बंगाल में चुनाव से पहले अधिकारियों के तबादलों को लेकर राज्य सरकार और केंद्र के बीच जारी तनाव के बीच यह कदम उठाया गया है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कई मौकों पर आरोप लगा चुकी हैं कि इस तरह के तबादले राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं. चुनाव आयोग के आदेश के अनुसार, कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, उत्तर और दक्षिण 24 परगना, हावड़ा, हुगली, पूर्व और पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुड़ा और बीरभूम जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण जिलों में यह फेरबदल लागू होगा. आयोग के नियमों के मुताबिक, जो अधिकारी एक ही स्थान पर लंबे समय से तैनात हैं या जिनके कार्यक्षेत्र में निष्पक्षता को लेकर सवाल उठ सकते हैं, उन्हें चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पहले बदलना अनिवार्य होता है. ब्लॉक स्तर पर चुनाव संचालन की जिम्मेदारी BDO के कंधों पर होती है. मतदाता सूची के पुनरीक्षण से लेकर मतदान केंद्रों की व्यवस्था तक, ये अधिकारी चुनाव की रीढ़ माने जाते हैं।

राज्य प्रशासन ने इन अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से नए पदों पर कार्यभार संभालने का निर्देश दिया है. जानकारों का मानना है कि यह केवल शुरुआत है, आने वाले दिनों में पुलिस प्रशासन और जिला स्तर के बड़े अधिकारियों के तबादले भी देखने को मिल सकते हैं. एक तरफ जहां प्रशासनिक फेरबदल हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल का विपक्ष-मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP), वाम मोर्चा और कांग्रेस-सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) को घेरने के लिए कमर कस चुका है. विपक्ष का आरोप रहा है कि बंगाल में ‘प्रशासन का राजनीतिकरण’ हो चुका है, इसलिए वे केवल तबादलों से संतुष्ट नहीं हैं.
धांधली रोकने को BJP का ‘सशक्त साथी’ और विपक्ष का ‘पहरा’
पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव में इस बार मुकाबला केवल रैलियों और नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि असली लड़ाई ‘बूथ प्रबंधन’ के स्तर पर लड़ी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने राज्य के हर बूथ पर ‘सशक्त साथी’ नियुक्त करने की एक विशेष रणनीति तैयार की है। वहीं, भाजपा इस बार ‘बूथ प्रबंधन’ पर सबसे ज्यादा जोर दे रही है. बीजेपी ने राज्य के प्रत्येक बूथ पर ‘सशक्त साथी’ नियुक्त करने की योजना बनाई है जो मतदान के दिन किसी भी प्रकार की हिंसा या धांधली की रिपोर्ट सीधे आयोग और पार्टी के वॉर रूम को करेंगे. इसके अलावा, सुवेंदु अधिकारी और सुकांत मजूमदार जैसे नेता लगातार केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की जल्दी तैनाती की मांग कर रहे हैं, ताकि मतदाताओं में सुरक्षा का भाव पैदा हो सके. अगर बात करें विपक्ष की तो सीपीएम और कांग्रेस का गठबंधन भी इस बार डिजिटल निगरानी पर ध्यान दे रहा है. ‘पहरा दो’ जैसे अभियानों के जरिए युवाओं को जोड़ा जा रहा है ताकि ब्लॉक स्तर पर होने वाली किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखी जा सके. विपक्ष का स्पष्ट मानना है कि यदि प्रशासन निष्पक्ष रहा, तो बंगाल के चुनावी नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं.
क्या टूटेगा ‘ब्लॉक पॉलिटिक्स’ का चक्रव्यूह?
पश्चिम बंगाल का चुनावी इतिहास हिंसा और आरोपों-प्रत्यारोपों से भरा रहा है. ऐसे में 83 BDO का तबादला करना आयोग का एक संदेश है कि वह ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर काम करेगा. हालांकि, तृणमूल कांग्रेस ने इसे एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताया है. टीएमसी नेतृत्व का कहना है कि वे चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार हैं और विकास के मुद्दे पर जनता के बीच जाएंगे. लेकिन असली चुनौती ‘ब्लॉक पॉलिटिक्स’ को नियंत्रित करने की है. बंगाल में ब्लॉक स्तर के अधिकारी अक्सर स्थानीय नेताओं के सीधे संपर्क में होते हैं. आयोग ने इस बार उन अधिकारियों पर भी गाज गिराई है जो अपेक्षाकृत कम समय से तैनात थे, लेकिन जिनकी कार्यप्रणाली पर संदेह जताया गया था. यह इस बात का संकेत है कि इस बार चुनाव आयोग केवल ‘तीन साल के कार्यकाल’ वाले नियम तक सीमित नहीं है, बल्कि वह खुफिया रिपोर्टों के आधार पर भी कदम उठा रहा है.
क्या बदल जाएगी बंगाल की चुनावी तस्वीर?
जैसे-जैसे 2026 की तारीख नजदीक आएगी, राजनीतिक पारा चढ़ना तय है. विपक्ष का मुख्य फोकस इस बार ‘मतदाता सुरक्षा’ और ‘फर्जी मतदान’ को रोकना है. वहीं आयोग द्वारा किए गए ये तबादले यह सुनिश्चित करने का प्रयास हैं कि पश्चिम बंगाल में चुनाव केवल बैलेट या ईवीएम की लड़ाई नहीं, बल्कि प्रशासनिक नियंत्रण की भी लड़ाई है. 83 अधिकारियों का यह फेरबदल उस बड़ी बिसात का हिस्सा है, जिसकी परिणति आने वाले महीनों में और भी कड़े फैसलों के रूप में दिख सकती है. क्या ये नए अधिकारी निष्पक्षता की कसौटी पर खरे उतरेंगे? यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल बंगाल में ‘चुनावी मोड’ पूरी तरह सक्रिय हो चुका है.