पश्चिम बंगाल: पश्चिम बंगाल में एक ऐतिहासिक पल होने जा रहा है, जब सुवेंदु अधिकारी ‘दादा’ आज सुबह 11 बजे राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। यह शपथ ग्रहण समारोह कोलकाता के प्रसिद्ध ब्रिगेड परेड ग्राउंड में आयोजित किया जा रहा है, जो पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक अहम स्थल रहा है।
समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन, केंद्रीय मंत्री और एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल होने की संभावना है। यह शपथ ग्रहण न केवल पश्चिम बंगाल के लिए, बल्कि भारतीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि सुवेंदु अधिकारी राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बनेंगे।
इससे पहले, शुक्रवार को कोलकाता के कन्वेंशन सेंटर में आयोजित विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से सुवेंदु अधिकारी को नेता चुना गया था। अमित शाह ने इस निर्णय की औपचारिक घोषणा की, और उसके बाद सुवेंदु अधिकारी ने राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया।
भव्य आयोजन की तैयारी
शपथ ग्रहण समारोह को लेकर जबरदस्त तैयारियाँ की गई हैं। कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड को शानदार तरीके से सजाया गया है। यहां वॉटरप्रूफ टेंट लगाए गए हैं, और मैदान में बंगाल के प्रसिद्ध झालमुड़ी और रसगुल्ला के स्टॉल भी लगाए गए हैं। पंडाल को बंगाल की पारंपरिक और सांस्कृतिक धरोहर की थीम पर सजाया गया है, जो इस कार्यक्रम को और भी आकर्षक बनाएगा। इस समारोह में एक लाख से ज्यादा लोगों के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है, जो भाजपा कार्यकर्ताओं के उत्साह और बंगाल की राजनीति में इस नए बदलाव को लेकर अपार समर्थन को दर्शाता है।
इस बड़े आयोजन की सुरक्षा में 4 हजार जवान तैनात किए गए हैं, ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके। भाजपा कार्यकर्ता और समर्थक इस शपथ ग्रहण समारोह को लेकर जबरदस्त उत्साह में हैं, और शनिवार को होने वाले इस ऐतिहासिक दिन का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। सुवेंदु ‘दादा’ के मुख्यमंत्री बनने की यह घड़ी पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत कर रही है, और इससे भाजपा के लिए राज्य में अपनी पकड़ को मजबूत करने की एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान हो रहा है।
सुवेंदु ‘दादा के शपथ समारोह में दिखेगा ‘असली’ बंगाल!
- ब्रिगेड परेड ग्राउंड में पंडाल को बंगाल को सांस्कृतिक धरोहर से सजाया गया
- ‘छऊ’ नृत्य, ‘बाउल गायकी और ‘मंझेरी’ लोक कला की मनमोहक झलक
- रवींद्रनाथ ठाकुर, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जैसे महान कवियों, लेखकों के पोस्टर भी लगाए गए
- दक्षिणेश्वर मंदिर के शिलालेख, सुंदरता से जुड़े कलात्मक रूपों से ग्राउंड को सजाया गया
- पंडाल में ‘झालमुड़ी’, ‘रसगुल्ला’ और ‘संदेश’ के स्टाइलिश स्टॉल भी लगाया गया
- सुरक्षा के दृष्टिकोण से लगभग 4,000 पुलिसकर्मियों को तैनात किए गए1
ब्रिगेड मैदान के चप्पे-चप्पे पर ‘तीसरी आंख’ का पहरा
कोलकाता का ऐतिहासिक ब्रिगेड ग्राउंड इस समय एक अभेद्य किले में तब्दील हो चुका है। शपथ ग्रहण समारोह और विजय रैली की भव्यता को देखते हुए प्रशासन सुरक्षा के मोर्चे पर रत्ती भर भी जोखिम नहीं लेना चाहता. पूरे मैदान को 35 हाई-अलर्ट सेक्टरों में विभाजित किया गया है, जहाँ हर एक ब्लॉक की कमान सीधे एक IPS अधिकारी के हाथों में सौंपी गई है.

सुरक्षा का यह चक्र इतना सख्त है कि ज़मीन पर कोलकाता पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों (CAPF) के हजारों जवान मुस्तैद हैं, तो वहीं आसमान से ड्रोन की ‘तीसरी आँख’ हर संदिग्ध हलचल पर पैनी नज़र रख रही है. इस पूरी सुरक्षा व्यवस्था की कमान खुद कोलकाता पुलिस आयुक्त संभाल रहे हैं, ताकि आयोजन का हर पल निर्विघ्न और सुरक्षित रहे. प्रशासन का संकल्प साफ है. अनुशासन और सुरक्षा के बीच इस ऐतिहासिक जीत का जश्न बेदाग होगा।
दीदी के गढ़ में सुवेंदु ‘दादा का ‘महा-विजय’
सुवेंदु अधिकारी की ताजपोशी के पीछे सबसे प्रमुख कारण उनका ममता बनर्जी को उनके घर में मात देना है। 2021 में नंदीग्राम चुनाव में ममता बनर्जी को हराने के बाद, इस बार सुवेंदु ‘दादा ने भवानीपुर में उन्हें लगभग 15 हजार मतों के बड़े अंतर से हराकर यह साबित किया कि वह केवल एक संघर्षशील नेता ही नहीं, बल्कि एक सशक्त विपक्षी भी हैं। बंगाल के इतिहास में यह एक असाधारण घटना है, क्योंकि आमतौर पर मुख्यमंत्री जैसे उच्च पद पर आसीन नेताओं के खिलाफ किसी विपक्षी नेता का जीतना बहुत दुर्लभ होता है। यह उदाहरण न केवल सुवेंदु के लिए एक बड़ी राजनीतिक जीत है, बल्कि यह भाजपा के लिए भी एक रणनीतिक जीत का प्रतीक बन गया है।
भाजपा नेतृत्व ने साफ संदेश दिया है कि अब वह केवल उन्हीं नेताओं को आगे बढ़ने का अवसर देंगे, जो जमीनी स्तर पर संघर्ष करेंगे और जिनमें अपने प्रतिद्वंद्वियों को चुनौती देने की क्षमता हो। सुवेंदु अधिकारी ने इस संदेश को पूरी तरह से आत्मसात करते हुए ममता बनर्जी जैसी बड़ी नेता को उनके गढ़ में हराया है, जिससे उनकी नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक कौशल पर सवाल उठाने वालों को जवाब मिल गया है।

यह चुनावी परिणाम केवल एक व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक रणनीति की जीत भी है, जिसमें विपक्ष के भीतर सक्रिय संघर्ष और निर्णायक नेतृत्व को महत्व दिया गया है। सुवेंदु की जीत ने भाजपा के मजबूत नेतृत्व के तर्क को और अधिक सशक्त किया है, जो भविष्य में और अधिक संभावनाओं के द्वार खोल सकता है। इस प्रकार, उनका यह विजय अभियान भाजपा की आगामी राजनीति के लिए एक दिशा-निर्देश हो सकता है।
भाजपा 2016 की 3 सीट से 2026 की सत्ता तक
पश्चिम बंगाल बीजेपी के लिए हमेशा एक चुनौतीपूर्ण मैदान रहा है, जहां पर पार्टी को अपने पैर जमाने के लिए कई दशकों तक संघर्ष करना पड़ा। 1982 से विधानसभा चुनाव लड़ने के बावजूद, बीजेपी को 34 वर्षों तक विधानसभा में जीत नहीं मिल पाई। लेकिन 2016 के विधानसभा चुनाव ने पार्टी के लिए एक नई शुरुआत की, जब बीजेपी ने पहली बार तीन सीटों पर जीत हासिल की। उस समय बीजेपी का वोट शेयर केवल 10.3% था, जो पार्टी की स्थिति को दर्शाता था।
इसके बाद 2021 में, बीजेपी ने बंगाल विधानसभा चुनाव में अपने प्रदर्शन को काफी बेहतर किया। पार्टी को लगभग 38.4% वोट शेयर मिला और उसने 77 सीटों पर जीत दर्ज की। इस जीत ने बीजेपी को बंगाल में एक सशक्त विपक्षी पार्टी के रूप में स्थापित किया। पार्टी का यह प्रदर्शन एक महत्वपूर्ण संकेत था कि बंगाल में बीजेपी का जनाधार बढ़ रहा था और पार्टी अपनी स्थिति को मजबूती से पेश कर रही थी।

लेकिन 2026 का विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए एक ऐतिहासिक पल बनकर सामने आया। पार्टी ने बंगाल की राजनीति में एक अभूतपूर्व जीत हासिल की, जब उसने लगभग 45.84% वोट शेयर प्राप्त किया और कुल 207 सीटों पर जीत दर्ज की। कुल 294 सीटों में से 207 सीटों के साथ बीजेपी ने सत्ता में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। यह पश्चिम बंगाल में किसी भी पार्टी के लिए अब तक का सबसे ऊँचा वोट शेयर माना जा रहा है और बीजेपी की ऐतिहासिक जीत का प्रतीक बन गया है।
बीजेपी की यह जीत केवल चुनावी सफलता नहीं बल्कि बंगाल में पार्टी की मजबूत पकड़ को भी दर्शाती है। इसने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई दिशा दी है और यह स्पष्ट कर दिया है कि बीजेपी अब राज्य की राजनीति का एक अहम हिस्सा बन चुकी है।
बीजेपी के गठन के बाद 1982 में पार्टी ने बंगाल में पहला विधानसभा चुनाव लड़ा था। पार्टी को खाता खोलने में 34 साल लगे और 2016 में उसने 3 सीटें जीतें। तब पार्टी का वोट शेयर 10.3% था। 2021 में भाजपा ने 38.4% वोट शेयर के साथ 77 सीटें हासिल कीं। इस बार पार्टी ने 45.84% वोट शेयर के साथ 207 सीटें हासिल कीं।
जानिए कौन है. सुवेंदु ‘दादा’?
सुवेंदु ‘दादा भारतीय राजनीति के एक प्रमुख नेता हैं, जो पश्चिम बंगाल के राष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण चेहरा बन चुके हैं। उनका राजनीतिक करियर पश्चिम बंगाल की राजनीति से जुड़ा हुआ है, और उन्होंने कई महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं और बदलावों में अपनी भूमिका निभाई है। उनका सफर एक लंबा और रोमांचक रहा है। आइए, उनके राजनीतिक सफर पर एक नजर डालते हैं। सुवेंदु अधिकारी का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले के कांटियान गांव में हुआ था। वह एक राजनीतिक परिवार से आते हैं, जिनके परिवार के सदस्य वर्षों से बंगाल की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। उनके पिता, उमापति अधिकारी, पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक प्रमुख नाम थे। सुवेंदु ‘दादा की शिक्षा की शुरुआत गांव के स्कूलों से हुई, और बाद में उन्होंने शिक्षा के लिए कोलकाता का रुख किया। उन्होंने अपने जीवन में प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता में पूरी की और फिर राजनीति की ओर रुख किया।

राजनीतिक करियर की शुरुआत
सुवेंदु अधिकारी ने अपनी राजनीति की शुरुआत तृणमूल कांग्रेस (TMC) से की थी। वह बहुत ही कम उम्र में ही ममता बनर्जी के साथ जुड़ गए थे और उन्होंने तृणमूल कांग्रेस में एक महत्वपूर्ण नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने ममता बनर्जी के साथ काम करते हुए पार्टी के विभिन्न पदों पर कार्य किया और बहुत जल्दी राजनीति में अपनी जगह बना ली।
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ जुड़ाव
सुवेंदु ‘दादा ने 1990 के दशक में ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) से जुड़कर राजनीति में कदम रखा। वह ममता बनर्जी के क़रीबी सहयोगी के रूप में उभरे और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सुवेंदु ‘दादा ने तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक कार्यों को संभाला और पार्टी के चुनावी अभियानों को दिशा दी।
2001 में सुवेंदु ‘दादा ने ममता बनर्जी द्वारा पश्चिम बंगाल में पार्टी का प्रमुख चेहरा बनाया गया। तब से वह पार्टी के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करते रहे। उनकी कार्यशैली और ममता बनर्जी के प्रति उनकी वफादारी ने उन्हें तृणमूल कांग्रेस में एक प्रमुख नेता बना दिया।
विधानसभा चुनाव और नंदीग्राम
सुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक करियर एक नया मोड़ तब लेता है जब उन्होंने 2006 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम से जीत हासिल की। 2007 में नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण आंदोलन के दौरान, सुवेंदु अधिकारी ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई और ममता बनर्जी के नेतृत्व में आंदोलन का समर्थन किया। नंदीग्राम की जीत ने उन्हें पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक प्रमुख नेता बना दिया।
2011 तृणमूल कांग्रेस की सरकार
2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की। इस चुनाव में सुवेंदु अधिकारी को नंदीग्राम से चुनावी मैदान में उतारा गया, जहां उन्होंने जीत दर्ज की। यह चुनाव बंगाल के इतिहास में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने का महत्वपूर्ण क्षण था। सुवेंदु अधिकारी ने राज्य सरकार में मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला और विभिन्न विभागों की जिम्मेदारी ली।
2016 के बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने फिर से शानदार जीत दर्ज की और सुवेंदु अधिकारी को मंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई। वह परिवहन और अन्य विभागों के मंत्री रहे और राज्य में विकास कार्यों की निगरानी की।
2021 विधानसभा चुनाव और भाजपा में प्रवेश
2021 का बंगाल विधानसभा चुनाव बंगाल की राजनीति के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ था। सुवेंदु अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थामा। यह कदम राजनीति में बड़े बदलाव का प्रतीक बना। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने न केवल तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई, बल्कि ममता बनर्जी की सरकार को चुनौती भी दी। नंदीग्राम चुनाव 2021 में सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराकर यह साबित किया कि वह भाजपा में आने के बाद भी अपने क्षेत्र में मजबूत हैं। नंदीग्राम की सीट पर उनका मुकाबला ममता बनर्जी से था, जो मुख्यमंत्री थीं, और यह चुनाव बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ साबित हुआ।
2026 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों पर शानदार जीत दर्ज की, जिसमें खासकर भवानीपुर में ममता बनर्जी को पराजित करना उनकी राजनीतिक क्षमता का बड़ा प्रमाण माना जा रहा है। 2026 के परिणामों के बाद सुवेंदु अधिकारी भाजपा के विधायक दल के नेता चुने गए। उनका राजनीतिक सफ़र एक ऐसे नेता का परिदृश्य पेश करता है जिसने समय‑समय पर अपने राजनीतिक फैसलों और रणनीति से बंगाल के राजनीतिक समीकरण को बदल दिया।


























