अजित पवार पंचतत्व में हुए विलीन, राजनीतिक गढ़ बारामती में राजकीय सम्मान के साथ हुआ अंतिम संस्कार, बेटे जय पवार ने दी मुखाग्नि.

बारामती, महाराष्ट्र: महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और एनसीपी प्रमुख अजित पवार का अंतिम संस्कार गुरुवार को उनके राजनीतिक गढ़ बारामती स्थित विद्या प्रतिष्ठान मैदान में पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। आपको बता दें उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख अजित पवार का बुधवार सुबह एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया। बताया गया कि यह हादसा सुबह करीब 8.45 बजे हुआ, जिसमें अजित पवार के साथ उनके सुरक्षाकर्मी, दो पायलट और एक महिला क्रू सदस्य समेत कुल पांच लोगों की मौत हो गई। इस खबर के सामने आते ही पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ गई और राजनीतिक गलियारों से लेकर आम जनता तक गहरा सदमा देखने को मिला। उनके निधन पर महाराष्ट्र में 3 दिन का राजकीय शोक रखा गया है। इस दौरान राज्यभर की सभी सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा। बारामती में अंतिम विदाई, उमड़ा जनसैलाब गुरुवार को अजित पवार का अंतिम संस्कार उनके राजनीतिक गढ़ बारामती स्थित विद्या प्रतिष्ठान मैदान में किया गया। सुबह उनके पार्थिव शरीर को काटेवाड़ी स्थित उनके आवास लाया गया, जहां परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और समर्थकों ने अंतिम दर्शन किए। जैसे ही अंतिम यात्रा निकली, सड़कों के दोनों ओर लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। “अजित दादा अमर रहे” के नारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा, जो इस बात का प्रमाण था कि जनता के बीच उनकी कितनी गहरी पकड़ और लोकप्रियता थी। अंतिम यात्रा के दौरान बारामती और आसपास के इलाकों में कई जगहों पर जाम की स्थिति भी देखने को मिली। हजारों लोग अपने प्रिय नेता को अंतिम विदाई देने पहुंचे। विद्या प्रतिष्ठान मैदान में हुए अंतिम संस्कार में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। उनके दोनों बेटों ने मुखाग्नि दी, जबकि परिवार के अन्य सदस्य गहरे शोक में डूबे नजर आए। राजनीतिक दिग्गजों की मौजूदगी, श्रद्धांजलियों का सैलाब अजित पवार के अंतिम संस्कार में देश और राज्य की कई प्रमुख राजनीतिक हस्तियां शामिल हुईं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, एनसीपी प्रमुख शरद पवार, वरिष्ठ कांग्रेस नेता सुशील कुमार शिंदे और उनकी बेटी प्रणिति शिंदे, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे के साथ-साथ अभिनेता रितेश देशमुख भी श्रद्धांजलि देने पहुंचे। एनसीपी, भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं ने अजित पवार को एक सशक्त प्रशासक, कुशल रणनीतिकार और जमीन से जुड़े नेता के रूप में याद किया। शरद पवार और सुनेत्रा पवार भावुक नजर आए, वहीं भतीजे रोहित पवार समेत परिवार के अन्य करीबी सदस्य पूरे समय मौजूद रहे। राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सभी दलों के नेताओं ने उनके योगदान को स्वीकार किया और उनके निधन को महाराष्ट्र की राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति बताया। सहकार से सत्ता तक: अजित पवार का राजनीतिक सफर “अजित दादा” के नाम से लोकप्रिय अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को अहमदनगर जिले के देओलाली प्रवरा में हुआ था। उन्होंने राजनीति की शुरुआत सहकारी आंदोलन से की। दुग्ध संघों, चीनी मिलों, सहकारी समितियों और बैंकों से जुड़े कार्यों के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण महाराष्ट्र की नब्ज को करीब से समझा। यही अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीतिक पहचान की नींव बना। वर्ष 1991 में अजित पवार बारामती से लोकसभा सांसद चुने गए, लेकिन उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के लिए सीट खाली कर दी और राज्य की राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। समय के साथ वे महाराष्ट्र के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने लगे। अजित पवार गैर-लगातार छह बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बने और इस तरह वे राज्य के सबसे लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले नेताओं में शामिल हो गए। उन्होंने पृथ्वीराज चव्हाण, देवेंद्र फडणवीस, उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे की सरकारों में उपमुख्यमंत्री के रूप में काम किया। इसके अलावा उन्होंने वित्त, सिंचाई और अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली और कई नीतिगत फैसलों में अहम भूमिका निभाई। उनकी पहचान एक सख्त लेकिन परिणाम देने वाले प्रशासक की रही। अपने निर्वाचन क्षेत्र बारामती से उनका रिश्ता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी था। विकास कार्यों और स्थानीय मुद्दों को लेकर उनकी सक्रियता ने उन्हें जनता के बीच खास स्थान दिलाया। विमान दुर्घटना में अजित पवार की असमय मृत्यु ने न केवल उनके परिवार और समर्थकों को, बल्कि पूरे महाराष्ट्र को गहरे शोक में डाल दिया है। उनके जाने से राज्य की राजनीति में जो खालीपन पैदा हुआ है, उसे भर पाना आसान नहीं होगा। अजित पवार को एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने दशकों तक महाराष्ट्र की राजनीति को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।