Wednesday, March 11, 2026
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मकर संक्रांति, पोंगल 2026: देशभर में मकर संक्रांति, पोंगल का उत्साह, जानिए मकर संक्रांति और पोंगल का पौराणिक इतिहास.

देशभर में मकर संक्रांति, पोंगल का उत्साह, जानिए मकर संक्रांति और पोंगल का पौराणिक इतिहास.

मकर संक्रांति, पोंगल 2026: आज पूरा भारत आस्था, परंपरा और उल्लास के रंग में रंगा हुआ है। मकर संक्रांति और पोंगल जैसे पावन पर्व देश के हर कोने में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाए जा रहे हैं। उत्तर भारत में जहां मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर लाखों श्रद्धालु पवित्र स्नान कर पुण्य अर्जित कर रहे हैं, वहीं दक्षिण भारत में पोंगल पर्व नई फसल के स्वागत और सूर्य देव की आराधना का प्रतीक बनकर लोगों के जीवन में समृद्धि का संदेश दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पोंगल पर्व के अवसर पर दक्षिण भारत में उपस्थित होना इस पर्व के राष्ट्रीय महत्व को और अधिक रेखांकित करता है। संगम नगरी प्रयागराज से लेकर हरिद्वार की हरकी पौड़ी तक आज तड़के से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। “हर हर गंगे” और “जय मां गंगा” के जयकारों के बीच लोगों ने गंगा स्नान कर मकर संक्रांति के पावन दिन की शुरुआत की। मान्यता है कि इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिससे देवताओं का दिन आरंभ होता है। इसी कारण मकर संक्रांति को अत्यंत शुभ माना गया है और इस दिन किया गया दान, स्नान और जप कई गुना फल देता है। मकर संक्रांति का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व मकर संक्रांति हिंदू पंचांग का एक ऐसा दिव्य पर्व है, जो समय, परंपरा और आध्यात्मिक चेतना-तीनों को एक सूत्र में पिरो देता है। यह उन विरले त्योहारों में से है, जिसकी तिथि लगभग हर वर्ष समान रहती है, क्योंकि यह खगोलीय घटना पर आधारित है। इस दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उत्तरायण की शुभ यात्रा आरंभ होती है। उत्तरायण को भारतीय संस्कृति में प्रकाश, सकारात्मकता और जीवन में नए आरंभ का प्रतीक माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि देव से मिलने जाते हैं। यह कथा इस पर्व को पारिवारिक समरसता, क्षमा और आपसी मेल-मिलाप का संदेश देती है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने इसी पावन तिथि पर उत्तरायण सूर्य की प्रतीक्षा करते हुए देह त्यागी थी। माना जाता है कि इस समय शरीर त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और भी गहरा हो जाता है। भारत की विविध संस्कृति में मकर संक्रांति अनेक रंगों में खिलती है। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में यह खिचड़ी पर्व के रूप में मनाई जाती है, जहां दान और सेवा को विशेष महत्व दिया जाता है। गुजरात और राजस्थान में आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से सज जाता है, जो उल्लास और स्वतंत्रता का प्रतीक है। महाराष्ट्र में तिल-गुड़ के माध्यम से मधुर संबंधों का संदेश दिया जाता है, तो असम में भोगाली बिहू फसल उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इन सभी परंपराओं में एक साझा भावना है-कृतज्ञता, दानशीलता और प्रकृति के प्रति सम्मान। मकर संक्रांति हमें यह सिखाती है कि जीवन में बदलाव स्वाभाविक है और हर परिवर्तन अपने साथ नई रोशनी, नई आशा और नए अवसर लेकर आता है। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का उत्सव है। पोंगल: सूर्य और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में मनाया जाने वाला पोंगल पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, परिश्रम और आस्था के प्रति कृतज्ञता का जीवंत प्रतीक है। यह चार दिनों तक चलने वाला प्रमुख कृषि पर्व हर वर्ष नई फसल के आगमन पर पूरे प्रदेश में उल्लास और उमंग भर देता है। ‘पोंगल’ शब्द का अर्थ है “उफान आना” या “उबाल”, जो दूध और चावल के उबलने की उस शुभ घड़ी को दर्शाता है, जब घर-आंगन में समृद्धि, सुख और खुशहाली के आगमन की कामना की जाती है। पोंगल का इतिहास प्राचीन कृषि सभ्यताओं से जुड़ा है। उस समय किसान अपनी मेहनत से उगाई गई फसल के लिए सूर्य देव, धरती माता और पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करते थे, क्योंकि इन्हीं के सहयोग से जीवन संभव होता है। यह पर्व हमें प्रकृति के साथ संतुलन और सामंजस्य का संदेश देता है। पोंगल का पहला दिन भोगी पोंगल के रूप में मनाया जाता है, जब पुराने और अनुपयोगी वस्तुओं को त्याग कर नई शुरुआत का संकल्प लिया जाता है। दूसरा दिन सूर्य पोंगल होता है, जिसमें सूर्य देव की आराधना कर उन्हें नई फसल अर्पित की जाती है। तीसरे दिन मट्टू पोंगल पशुधन को समर्पित होता है; इस दिन बैलों और गायों को स्नान कराकर सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। चौथा दिन कन्नुम पोंगल पारिवारिक मेल-मिलाप और आनंद का दिन होता है। घरों के आंगन में बनी रंग-बिरंगी कोलम, पारंपरिक पोंगल व्यंजन की खुशबू, लोकनृत्य और गीत इस पर्व को और भी जीवंत बना देते हैं। पोंगल न केवल कृषि परंपरा का उत्सव है, बल्कि यह प्रेम, एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को भी मजबूत करता है। एक पर्व, अनेक रूप, एक भावना पूर्व भारत में गंगासागर मेले में श्रद्धालु गंगा सागर संगम में स्नान कर मोक्ष की कामना करते हैं, तो पश्चिम भारत में पतंगों से सजा आसमान इस पर्व की खुशी को उड़ान देता है। प्रयागराज के संगम पर डुबकी लगाते श्रद्धालु हों या तमिलनाडु में नई फसल का स्वागत करते किसान-हर दृश्य में आस्था, श्रम और उम्मीद की एक जैसी झलक दिखाई देती है। मकर संक्रांति और पोंगल केवल पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। ये पर्व हमें सूर्य, प्रकृति और परिश्रम के महत्व का बोध कराते हैं और यह सिखाते हैं कि विविधताओं के बावजूद भारत की सांस्कृतिक चेतना एक है। यही कारण है कि यह महापर्व पूरे देश को एक सूत्र में बांध देता है और हर वर्ष नई ऊर्जा, नई आशा और नई शुरुआत का संदेश देता है।