Wednesday, March 11, 2026
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लैंड फॉर जॉब केस: लालू-राबड़ी-तेजस्वी पर आरोप तय, 52 आरोपी आरोपमुक्त, बाकी पर तय होंगे आरोप

लैंड फॉर जॉब केस: लालू-राबड़ी-तेजस्वी पर आरोप तय, 52 आरोपी आरोपमुक्त, बाकी पर तय होंगे आरोप

नई दिल्ली। दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने शुक्रवार को बहुचर्चित लैंड फॉर जॉब मामले में अहम फैसला सुनाया। अदालत ने कुल 98 आरोपियों में से 52 को आरोपमुक्त कर दिया, जबकि शेष आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया। इस मामले में अब तक कुल 5 आरोपियों की मृत्यु हो चुकी है, और अदालत के आदेश के बाद 41 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलेगा। मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी।राऊज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व रेल मंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख, लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के कई सदस्यों के खिलाफ आरोप तय किए हैं। अदालत ने लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, उनके दोनों बेटे तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव, उनकी बेटी मीसा भारती, और उनकी बहन हेमा यादव के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया। लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार आपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा अदालत के अनुसार, लालू प्रसाद यादव ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपनी पत्नी और बच्चों के नाम पर बड़ी मात्रा में अचल संपत्तियां जुटाईं। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अन्य आरोपियों ने भी आपराधिक षड्यंत्र में सक्रिय रूप से मदद की। अदालत के अनुसार, रेलवे में नौकरियों के बदले जमीन लेने का एक गहरा षड्यंत्र चल रहा था, जिसमें कई लोगों को रेलवे में नौकरी दी गई और बदले में उनके या उनके परिजनों से जमीन ली गई।अदालत ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार इस आपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा थे, जबकि अन्य आरोपियों ने इसे अंजाम देने में मदद की। इस मामले में आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 और 120B के तहत आरोप तय किए गए हैं। इसके अलावा, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट) की धारा 13(1)(डी) और 13(2) के तहत भी आरोप तय किए गए हैं। जानें पूरा मामला ? ज़मीन के बदले नौकरी घोटाला साल 2004 से 2009 के बीच यूपीए सरकार के कार्यकाल में, जब लालू प्रसाद यादव देश के रेल मंत्री थे, उसी दौरान उन पर और उनके परिवार के सदस्यों पर एक बड़े और गंभीर घोटाले का आरोप लगा। यह मामला “ज़मीन के बदले नौकरी” घोटाले के नाम से जाना जाता है, जिसने भारतीय राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े किए। आरोप है कि रेल मंत्री रहते हुए लालू प्रसाद यादव ने रेलवे में ग्रुप-डी पदों पर भर्ती की प्रक्रिया को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। नियमों के अनुसार न तो किसी प्रकार का सार्वजनिक विज्ञापन जारी किया गया और न ही चयन की पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों को रेलवे में नौकरी दी गई। सीबीआई के अनुसार, इन नियुक्तियों में योग्यता, शिक्षा और पात्रता की कोई ठोस जांच नहीं की गई। यहां तक कि कई ऐसे लोगों को भी नौकरी दे दी गई, जो अपना नाम तक ठीक से लिखने में सक्षम नहीं थे। जांच एजेंसी का दावा है कि यह सब लालू यादव के दबाव और प्रभाव के कारण संभव हुआ। सीबीआई ने अदालत में दलील दी कि नौकरी पाने वाले अभ्यर्थियों ने या तो लालू यादव, उनके परिवार के सदस्यों या उनसे जुड़े करीबी लोगों के नाम पर अपनी ज़मीन उपहार में दी या फिर बेहद कम कीमत पर बेच दी। यही ज़मीन बाद में कथित तौर पर लालू परिवार के स्वामित्व या नियंत्रण में चली गई। सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक ने यह भी बताया कि नौकरी पाने वाले अधिकांश अभ्यर्थी बिहार के अत्यंत गरीब तबके से थे। उनकी आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाया गया और बदले में उन्हें सरकारी नौकरी का लालच दिया गया। जांच में यह भी सामने आया कि इन अभ्यर्थियों द्वारा प्रस्तुत कई शैक्षणिक दस्तावेज फर्जी स्कूलों और संस्थानों से जारी किए गए थे, जिससे पूरे चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए। इस मामले में सीबीआई ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक साजिश), 420 (धोखाधड़ी), 467, 468, 471 (जालसाजी से जुड़े अपराध) के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, 8, 9, 11, 12 और 13 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया। यह मामला न सिर्फ भ्रष्टाचार का उदाहरण माना जा रहा है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सत्ता के दुरुपयोग से किस तरह सरकारी संस्थानों की गरिमा को ठेस पहुंचाई जा सकती है। क्या होगा कोर्ट का अगला कदम ? दिल्ली की राऊज एवेन्यू कोर्ट ने 52 आरोपियों को आरोपमुक्त कर दिया, क्योंकि उनके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं पाए गए। बाकी आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए हैं और इस मामले में अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी। इस फैसले के बाद, मामले की जांच और सुनवाई में और भी तेजी आने की संभावना है। लैंड फॉर जॉब केस की गंभीरता लैंड फॉर जॉब मामला भारतीय राजनीति और प्रशासन में बड़े भ्रष्टाचार के मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन चुका है। अदालत का यह फैसला इस बात को और भी स्पष्ट करता है कि सत्ता और प्रभाव का दुरुपयोग किस हद तक हो सकता है। यह मामला जनता और प्रशासन दोनों के लिए एक चेतावनी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों को रोका जा सके। यहां तक कि राजनीतिक हस्तियों को भी न्याय के दायरे में लाना और भ्रष्टाचार को सजा देना ही लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है। इस मामले के परिणाम का असर न केवल लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार पर, बल्कि भारतीय राजनीति में भी हो सकता है।